अधूरी किताब
कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में यूँ दाख़िल होते हैं...
जैसे कोई अधूरी किताब...
हर सफ़्हे पर कुछ ऐसा तहरीर कर जाते हैं,
जो ता-उम्र ख़त्म नहीं होता...
उनसे जो गुफ़्तगू अधूरी रह गई थी,
वो हर रात तख़य्युल में मुख़ातिब होती है...
उनका जाना महज़ एक फ़ासला है,
इश्क़ तो आज भी यहीं कहीं रुका हुआ है...
मगर दिल मानता कहा है?
जैसे वो रुख़्सत नहीं हुआ,
बस मुझमें कहीं खो गया है...
शायद कुछ रिश्ते ऐसे ही होते हैं,
इंतज़ार से वजूद पाते हैं..
और इंतज़ार ही उनकी आख़िरी मंज़िल बन जाता है...
जैसे कोई अधूरी किताब...
हर सफ़्हे पर कुछ ऐसा तहरीर कर जाते हैं,
जो ता-उम्र ख़त्म नहीं होता...
उनसे जो गुफ़्तगू अधूरी रह गई थी,
वो हर रात तख़य्युल में मुख़ातिब होती है...
उनका जाना महज़ एक फ़ासला है,
इश्क़ तो आज भी यहीं कहीं रुका हुआ है...
मगर दिल मानता कहा है?
जैसे वो रुख़्सत नहीं हुआ,
बस मुझमें कहीं खो गया है...
शायद कुछ रिश्ते ऐसे ही होते हैं,
इंतज़ार से वजूद पाते हैं..
और इंतज़ार ही उनकी आख़िरी मंज़िल बन जाता है...
__sonia
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