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एक अधूरा ख़्वाब - यादों का सफ़र 📖

एक अधूरा ख़्वाब: यादों का सफ़र 📖

"कुछ कहानियाँ अधूरी रहकर ही मुकम्मल होती हैं..."

अध्याय 1: वो पहली बारिश और पुरानी बेंच

बात साल 2016 की है, जब मैंने पहली बार उसे कॉलेज की लाइब्रेरी के पास देखा था। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और वो अपनी किताबों को भीगने से बचाने की नाकाम कोशिश कर रही थी। मैंने अपनी छतरी उसकी तरफ बढ़ा दी। उस दिन जो बातचीत शुरू हुई, वो धीरे-धीरे गहरी दोस्ती और फिर मोहब्बत में बदल गई।

हम अक्सर कॉलेज के पीछे वाली पुरानी बेंच पर घंटों बैठे रहते थे। उसने एक बार मुझसे कहा था, "लवकुश, दुनिया चाहे कितनी भी बदल जाए, हम कभी नहीं बदलेंगे।"

अध्याय 2: दरार और खामोशी

जैसे-जैसे कॉलेज खत्म हुआ, जिंदगी की हकीकतें सामने आने लगीं। 2018 की वो आखिरी रात मुझे आज भी याद है। हम उसी बेंच पर बैठे थे, लेकिन इस बार हमारे बीच हंसी नहीं, बल्कि एक भारी खामोशी थी।

उसने रोते हुए कहा, "मेरे पिता मेरी बात नहीं मानेंगे।" मैंने उसका हाथ पकड़ना चाहा, पर उसने अपना हाथ पीछे खींच लिया। वो मुड़ी, मेरी तरफ एक आखिरी बार देखा, और अपनी नई जिंदगी की तरफ बढ़ गई।

अध्याय 3: पांच साल बाद - एक अधूरा सच

आज 2023 है। मैं रेलवे स्टेशन पर खड़ा था, तभी भीड़ में एक जानी-पहचानी खुशबू महसूस हुई। मैंने मुड़कर देखा, वो वही थी। उसकी उंगली में किसी और के नाम की अंगूठी थी और उसके हाथ में एक छोटा बच्चा था।

हमारी नजरें मिलीं। उस एक पल में हमने पांच साल की सारी बातें कर लीं। ट्रेन आई और मैं उसमें बैठ गया। मेरी डायरी में आज भी उस बेंच पर बिताए पलों के सूखे हुए फूल रखे हैं।

कहानी पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद।

© 2026 Sonki Thoughts | Lavkush Kumar

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