गुनाहों का देवता
अंतिम सत्य की खोज
इलाहाबाद की उन गलियों का सन्नाटा आज भी चन्दर के कानों में गूँजता होगा। वह कमरा, जहाँ किताबों की महक और चाय की प्याली से उठता धुआँ एक अलग ही दुनिया बनाता था। चन्दर और सुधा की कहानी का यह वह पड़ाव था जहाँ शब्द कम और खामोशियाँ ज़्यादा थीं।
"मर्यादा वह चादर है जिसे चन्दर ने ओढ़ तो लिया था, पर वही चादर अब उसका दम घोंट रही थी।"
सुधा ने जब चन्दर का हाथ पहली बार छुआ, तो वह केवल एक स्पर्श नहीं था। वह एक बिजली थी जिसने चन्दर के उन तमाम आदर्शों को जलाकर राख कर दिया। प्रोफेसर साहब का चेहरा उसकी आँखों के सामने आता, तो वह सिहर जाता।
चन्दर की साइकिल की वो आवाज, संगम की वो शामें और सुधा के खिलखिलाने का वो अंदाज़... क्या ये सब सिर्फ एक याद बनकर रह जाने वाला था? चन्दर के भीतर का 'देवता' मर रहा था और एक तड़पता हुआ प्रेमी जन्म ले रहा था।
सुधा ने एक बार पूछा था, "चन्दर भाई, क्या भगवान भी कभी रोते हैं?" तब चन्दर हँस दिया था, पर आज उसे महसूस हो रहा था कि जब आदर्श और प्रेम टकराते हैं, तो रूह के भीतर जो सैलाब आता है, वह किसी भी प्रार्थना से शांत नहीं होता।
(यहाँ से आपका 2 लाख शब्दों का सफर शुरू होता है...)
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