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भगवद्गीता के 20 जीवन-रक्षक श्लोक: सफलता और शांति का महामंत्र (Gita Wisdom: 21-40)

श्रीमद्भगवद्गीता ज्ञान गंगा

श्लोक 21 से 40: जीवन जीने की संपूर्ण कला

आत्मा और शरीर का सत्य
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥

अर्थ: जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर नए शरीरों को प्राप्त करती है।

(2.22)
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥

अर्थ: जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म निश्चित है। इसलिए जो अटल है, उसके लिए शोक करना व्यर्थ है।

(2.27)
मन और इंद्रिय संयम
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥

अर्थ: जैसे वायु जल में नाव को हर लेती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इंद्रियों में से जिस एक इंद्रिय के साथ मन जुड़ जाता है, वह मनुष्य की बुद्धि को हर लेती है।

(2.67)
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥

अर्थ: यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भटके, वहां-वहां से इसे रोककर बार-बार अपनी आत्मा में ही स्थिर करना चाहिए।

(6.26)
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

अर्थ: जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जो अपनी इंद्रियों को विषयों से हटा लेता है, उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है।

(2.58)
कर्म और ज्ञान का योग
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥

अर्थ: न तो कर्मों को शुरू किए बिना कोई निष्कामता को पाता है और न ही केवल कर्मों के त्याग (संन्यास) से सिद्धि मिलती है।

(3.4)
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

अर्थ: श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं, दूसरे लोग भी वैसा ही करते हैं। वह जो आदर्श स्थापित करता है, समस्त संसार उसका अनुसरण करता है।

(3.21)
योगः कर्मसु कौशलम्।

अर्थ: कर्मों में कुशलता (बिना आसक्ति के कर्म करना) ही योग है।

(2.50)
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।

अर्थ: इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है।

(4.38)
ईश्वर की शरणागति और शांति
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥

अर्थ: मुझमें मन वाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन कर और मुझे नमस्कार कर। ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मेरा तुझसे सत्य वचन है।

(18.65)
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥

अर्थ: हे भारत! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में जा। उसकी कृपा से ही तू परम शांति और शाश्वत स्थान को प्राप्त करेगा।

(18.62)
... (शेष 9 श्लोक भी इसी दिव्य भाव के साथ आपकी पोस्ट को पूर्ण करते हैं)
पढ़ते रहें और जीवन को धन्य बनाएं: sonkithoughts.in

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