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श्रीमद्भगवद्गीता के 10 और अनमोल श्लोक: मन को शांत करने के सूत्र (Gita Quotes Part-2)

दिव्य ज्ञान: भाग 2

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥
अर्थ: हे कृष्ण! यह मन बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाव वाला, बड़ा दृढ़ और बलवान है। इसे वश में करना मैं वायु को रोकने की भाँति अत्यंत कठिन मानता हूँ।
(अध्याय 6, श्लोक 34)
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥
अर्थ: श्री भगवान बोले- हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है, लेकिन इसे 'अभ्यास' और 'वैराग्य' (मोह का त्याग) से वश में किया जा सकता है।
(अध्याय 6, श्लोक 35)
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥
अर्थ: जिसका आहार और विहार (घूमना-फिरना) संतुलित है, जिसका कर्मों में चेष्टा संतुलित है और जिसका सोना तथा जागना भी संतुलित है, उसका योग ही दुखों का नाश करता है।
(अध्याय 6, श्लोक 17)
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति॥
अर्थ: जो मनुष्य सभी इच्छाओं को त्यागकर, ममता रहित और अहंकार रहित होकर विचारता है, वही परम शांति को प्राप्त करता है।
(अध्याय 2, श्लोक 71)
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥
अर्थ: जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह सब मैं स्वीकार करता हूँ।
(अध्याय 9, श्लोक 26)
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥
अर्थ: काम, क्रोध और लोभ—ये तीन प्रकार के नरक के द्वार हैं जो आत्मा का नाश करने वाले हैं। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।
(अध्याय 16, श्लोक 21)
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥
अर्थ: कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणभर भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। प्रकृति के गुणों के वश में होकर हर किसी को कर्म करना ही पड़ता है।
(अध्याय 3, श्लोक 5)
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
अर्थ: जो अनन्य प्रेमी भक्त मेरा निरंतर चिंतन करते हुए मुझे भजते हैं, उन नित्य निरंतर मुझमें स्थित रहने वाले पुरुषों का योग-क्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।
(अध्याय 9, श्लोक 22)
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥
अर्थ: सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान समझकर, उसके बाद तू युद्ध के लिए तैयार हो जा; इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप को प्राप्त नहीं होगा।
(अध्याय 2, श्लोक 38)
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो।
अर्थ: मैं समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (भ्रम का नाश) होता है।
(अध्याय 15, श्लोक 15)

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