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श्रीमद्भगवद्गीता के 10 महान श्लोक जो आपकी ज़िंदगी बदल देंगे (Bhagavad Gita Quotes in Hindi)

श्रीमद्भगवद्गीता अमृत

जीवन के हर द्वंद्व का समाधान

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
अर्थ: तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो और तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो।
(अध्याय 2, श्लोक 47)
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
अर्थ: हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात प्रकट होता हूँ।
(अध्याय 4, श्लोक 7)
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥
अर्थ: इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती, जल इसे गीला नहीं कर सकता और वायु इसे सुखा नहीं सकती। (आत्मा अमर है)
(अध्याय 2, श्लोक 23)
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
अर्थ: विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उनमें आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से इच्छा पैदा होती है और इच्छा में बाधा पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है।
(अध्याय 2, श्लोक 62)
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
अर्थ: क्रोध से मूढ़ता आती है, मूढ़ता से स्मृति भ्रमित होती है, स्मृति भ्रम से बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि नष्ट होने से इंसान का पतन हो जाता है।
(अध्याय 2, श्लोक 63)
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥
अर्थ: जितेन्द्रिय और साधनपरायण श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान प्राप्त करता है तथा ज्ञान प्राप्त करके वह तत्काल परम शांति को प्राप्त हो जाता है।
(अध्याय 4, श्लोक 39)
संशयात्मा विनश्यति।
अर्थ: संदेह (शक) करने वाले व्यक्ति का विनाश निश्चित है। वह न इस लोक में सुख पाता है, न परलोक में।
(अध्याय 4, श्लोक 40)
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥
अर्थ: हे धनंजय! आसक्ति को त्यागकर तथा सफलता और असफलता में समान भाव रखकर योग में स्थित होकर कर्म कर। यह समभाव ही योग कहलाता है।
(अध्याय 2, श्लोक 48)
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
अर्थ: मनुष्य को चाहिए कि वह स्वयं अपना उद्धार करे, अपने आप को नीचे न गिराए। क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु।
(अध्याय 6, श्लोक 5)
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
अर्थ: सब धर्मों (कर्तव्यों) को छोड़कर तू केवल मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर।
(अध्याय 18, श्लोक 66)

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